Root race/hi: Difference between revisions

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प्रत्येक मूल मानव जाति (root race) एक [[Special:MyLanguage/Manu|मनु]] (Manu) के संरक्षण या मार्गदर्शन में विकसित होती है। संस्कृत में ‘मनु’ का अर्थ ‘प्रजापिता’ (सृष्टिकर्ता/वंश प्रवर्तक) या ‘विधि-निर्माता’ (कानून देने वाला) होता है। मनु उस जाति के लिए दिव्य चेतना का प्रतिनिधित्व करता है।  
प्रत्येक मूल मानव जाति (root race) एक [[Special:MyLanguage/Manu|मनु]] (Manu) के संरक्षण या मार्गदर्शन में विकसित होती है। संस्कृत में ‘मनु’ का अर्थ ‘प्रजापिता’ (सृष्टिकर्ता/वंश प्रवर्तक) या ‘विधि-निर्माता’ (कानून देने वाला) होता है। मनु उस जाति के लिए दिव्य चेतना का प्रतिनिधित्व करता है।  


* [[Special:MyLanguage/Lord Himalaya|हिमालय]] (Lord Himalaya) और उनकी दिव्य पूरक (divine complement) चौथी मूल मानव वंश (fourth root race) के मनु हैं।
* [[Special:MyLanguage/Lord Himalaya|हिमालय]] (Lord Himalaya) और उनकी दिव्य पूरक (divine complement) चौथी मूल मानव जाति (fourth root race) के मनु हैं।
* [[Special:MyLanguage/Vaivasvata Manu|वैवस्वता मनु]] (Vaivasvata Manu) और उनकी दिव्य पूरक पाँचवीं मूल मानव वंश (fifth root race) के मनु हैं।
* [[Special:MyLanguage/Vaivasvata Manu|वैवस्वता मनु]] (Vaivasvata Manu) और उनकी दिव्य पूरक पाँचवीं मूल मानव जाति (fifth root race) के मनु हैं।
* [[Special:MyLanguage/God and Goddess Meru|देव और देवी मेरु]] (God and Goddess Meru) छठी मूल मानव वंश (sixth root race) के मनु हैं।
* [[Special:MyLanguage/God and Goddess Meru|देव और देवी मेरु]] (God and Goddess Meru) छठी मूल मानव जाति (sixth root race) के मनु हैं।
* [[Special:MyLanguage/Great Divine Director|महान दिव्य निर्देशक]] (Great Divine Director) और उनकी दिव्य पूरक आने वाली [[Special:MyLanguage/seventh root race|सातवीं मूल मानव वंश]] (seventh root race) के मनु हैं।
* [[Special:MyLanguage/Great Divine Director|महान दिव्य निर्देशक]] (Great Divine Director) और उनकी दिव्य पूरक आने वाली [[Special:MyLanguage/seventh root race|सातवीं मूल मानव जाति]] (seventh root race) के मनु हैं।


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Revision as of 09:58, 22 May 2026

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मूल मानव जाति जीवात्माओं का वो एक समूह है जो सभी एक साथ पृथ्वी पर जन्म लेती हैं। इन सब का एक विशिष्ट आदर्श स्वरूप होता है, सबकी एक ही दिव्य योजना होती है और उसे पूरा करने का ध्येय भी एक ही होता है। गुह्य परंपरा के अनुसार, सभी जीवात्माएं सात मूल जातियों में विभाजित हैं।

आदम और हव्वा (Adam and Eve) के पतन से पहले तीन स्वर्ण युगों में, पहली तीन मूल मानव जातियाँ पृथ्वी पर पवित्रता और निर्मलता के साथ रहती थीं। ब्रह्मांडीय नियमों का पालन और वास्तविक आत्मा के साथ पूर्ण तादात्म्य स्थापित करके, इन तीन मूल मानव जातियों ने अमरत्व प्राप्त कर लिया था तथा वे पृथ्वी से ऊपर के आयामों में चली गयी ।

चौथी मूल मानव जाति (Root Race) के समय में लेमुरिया (Lemuria) महाद्वीप पर पतित देवदूतों के अत्याधिक प्रभाव के परिणाम स्वरुप मानवता का पतन (fall) हुआ। इन पतित देवदूतों (fallen angels) को सर्प (serpent) के रूप में जाना जाता है,क्योंकि उन्होंने रीढ़ की सर्पाकार ऊर्जा (kundalini जैसी शक्ति) का उपयोग करके मानव की आत्मा या स्त्री-तत्व को भ्रमित किया। उनका उद्देश्य मानव के पुरुषत्व या दिव्य क्षमता को कम करना था, जिससे “ईश्वर के पुत्र” (Sons of God) कमजोर और आध्यात्मिक रूप से पतित हो जाएँ।

चौथी, पाँचवीं और छठी मूल मानव जातियाँ (जिसमें अंतिम आत्मा-समूह अभी पूरी तरह भौतिक शरीर में अवतरित नहीं हुआ है) आज भी पृथ्वी पर मौजूद हैं। सातवीं मूल जाति का भविष्य कुंभ युग (Aquarian Age) के समय दक्षिण अमेरिका महाद्वीप पर अवतरित होने के लिए नियत है।

मनु

प्रत्येक मूल मानव जाति (root race) एक मनु (Manu) के संरक्षण या मार्गदर्शन में विकसित होती है। संस्कृत में ‘मनु’ का अर्थ ‘प्रजापिता’ (सृष्टिकर्ता/वंश प्रवर्तक) या ‘विधि-निर्माता’ (कानून देने वाला) होता है। मनु उस जाति के लिए दिव्य चेतना का प्रतिनिधित्व करता है।

इसे भी देखिये

मनु

सातवीं मूल जाति

स्रोत

Pearls of Wisdom, vol. २५, no. ५३ २९ दिसम्बर १९८२.

Mark L. Prophet and Elizabeth Clare Prophet, Saint Germain On Alchemy: Formulas for Self-Transformation, एस वी “मनु”

Pearls of Wisdom, vol. ३७, no. १६ १७ अप्रैल १९९४.